एक बार रहीमदास जी गोवर्धन में श्रीनाथजी के दर्शन करने गए। रहीमदास जी अल्हड़ भेष में रहते थे। ऊपर से किसी कारणवश उन्हें मंदिर में प्रवेश नहीं दिया गया। जैसे ही वे पुनः मंदिर में जाने लगे, लोगों ने उन्हें धक्का देकर बाहर कर दिया और कहा –
"कहाँ घुसे चले जा रहे हो? यह विजातीयों का प्रवेश नहीं है।"
रहीम जी को इतना क्रोध आया कि वे ठाकुर जी से ही कहने लगे –
"आप कैसे परमात्मा हैं? कैसे स्वामी हैं? कैसे भगवान हैं? इतनी दूर से चलकर आया और आप मुझे दर्शन नहीं दे रहे, उल्टा लोगों से बाहर करवा रहे हैं।"
श्री रहीम जी इतने क्रोधित हो गए कि ठाकुर जी भीतर खड़े-खड़े पसीना आने लगा, और बाहर खड़े रहीम जी लगातार रोष कर रहे थे।
गोसाईं जी भोग लेकर गए। जैसे ही पर्दा लगाया, ठाकुर जी बोले –
"हमको नहीं पाना।"
गोसाईं जी ने कहा –
"ठाकुर जी, और कुछ बनवाकर लाते हैं।"
ठाकुर जी बोले –
"मुझे कुछ नहीं पाना।"
गोसाईं जी को लगा कि छप्पन भोग लगाते हैं, शायद मान जाएँ। 56 प्रकार के भोग बनाए गए और ठाकुर जी को अर्पित किए गए, परंतु इस बार भी ठाकुर जी ने भोग स्वीकार करने से मना कर दिया। ठाकुर जी ने स्पष्ट रूप से कुछ नहीं बताया कि वे क्यों भोग नहीं ले रहे हैं।
अतः गोसाईं जी ने पूछा –
“जय जय, क्या कोई अपराध हो गया है जिससे आप भोग नहीं पा रहे हैं?”
ठाकुर जी मुँह फुलाए बैठे रहे और बोले –
"मैं क्यों बताऊँ।"
गोसाईं जी समझ गए कि कोई बड़ा अपराध हुआ है। उन्होंने मंदिर के सभी सेवकों को एकत्र किया और पूछा –
"आज किसी से कोई अपराध बना है?"
तब द्वारपालों ने बताया –
"महाराज, आज एक पुरुष आया था। वह विजातीय था, उसके वस्त्र भी अच्छे नहीं थे, देखने में भी अजीब लग रहा था। हमें लगा मंदिर में उपद्रव करेगा, इसलिए हमने उसे अंदर नहीं जाने दिया और बाहर निकाल दिया।"
गोसाईं जी समझ गए कि उसी कारण ठाकुर जी व्याकुल हैं। उन्होंने सोचा –
"वह निश्चित ही ठाकुर जी का कोई परम भक्त है। ठाकुर जी उसके दर्शन करना चाहते थे।"
गोसाईं जी ने कहा –
"अब सुंदर प्रसाद बनाओ, उसे सिद्ध करके लाओ। वह यहीं कहीं बैठा होगा, अधिक दूर नहीं गया होगा, उसे लेकर आओ।"
मंदिर में प्रसाद बन रहा था, रहीम जी को प्रसन्न करने के लिए। परंतु ठाकुर जी इतने व्याकुल हो गए कि सोचने लगे –
"जब तक चूल्हा जलेगा, कड़ाही चढ़ेगी, तब तक रहीम जी वृंदावन चले जाएँगे।"
ठाकुर जी के समक्ष सोने का थाल प्रसाद से भरा हुआ रखा था। ठाकुर जी ने वह थाल अपने कंधे पर उठाया और स्वयं चल पड़े।
उधर रहीम जी गोविंद कुंड पर बैठे ठाकुर जी पर खूब गुस्सा कर रहे थे और खरी-खोटी सुना रहे थे।
लेकिन जैसे ही उन्होंने देखा कि गिरिराज पर्वत से श्यामसुंदर स्वयं हाथों में थाल लिए चले आ रहे हैं –
एक हाथ में बंसी और दूसरे से प्रसाद का थाल सँभाले हुए, अति शोभनीय वस्त्रों से विभूषित, वही स्वरूप जो मंदिर में विराजमान है – तो रहीम जी मंत्रमुग्ध हो गए।
उस रूप का वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता। उस समय रहीम जी ने ठाकुर जी की छवि का वर्णन किया:
छबि आवन मोहनलाल की।
काछे काछनि कलित मुरलि कर पीत पिछौरी साल की॥
बंक तिलक केसर को कीन्हो द्युति मानौं बिधु बाल की।
बिसरत नाहिं सखी मो मन सों चितवनि नैन बिसाल की॥
नीकी हँसनि अधर सधरनि छबि छीनी सुमन गुलाब की।
जल सों डारि दियो पुरइनि पै डोलनि मुकतामाल की॥
आप मोल बिन मोलनि डोलनि बोलनि मदन गोपाल की।
यह सरूप निरखै सोइ जानै यहि रहीम के हाल की॥
ठाकुर जी ने थाल रहीम जी के सामने रख दिया और स्वयं अंतर्धान हो गए।
इतने में गोसाईं जी अपने असंख्य सेवकों के साथ बहुत सारा प्रसाद बनवाकर लाए। जब वे रहीम जी के पास पहुँचे तो देखा कि वहाँ तो पहले से ही थाल रखा हुआ है – वही थाल जो ठाकुर जी के सामने अर्पित किया गया था।
रहीम जी नेत्र बंद किए हुए प्रसाद ग्रहण कर रहे थे।
गोसाईं जी ने पूछा –
"रहीम जी, यह थाल आपके पास कैसे आया?"
रहीम जी ने केवल यही कहा:
छबि आवन मोहनलाल की।
जल सों डारि दियो पुरइनि पै डोलनि मुकतामाल की॥
आप मोल बिन मोलनि डोलनि बोलनि मदन गोपाल की।
यह सरूप निरखै सोइ जानै यहि रहीम के हाल की॥
उस समय रहीम जी के नेत्र सजल थे और यह देखकर गोसाईं जी के नेत्र भी सजल हो गए।
गोसाईं जी कहने लगे –
"ठाकुर जी, वहाँ आपके लिए इतने सारे भोग सिद्ध किए जा रहे हैं और आप अपने भक्त के लिए इतने व्याकुल हो गए कि प्रतीक्षा भी न कर सके और स्वयं अपना थाल लेकर चल पड़े।"
✨ यह कथा दर्शाती है कि भगवान जाति-पाँति, रूप या वेशभूषा नहीं देखते। वे तो केवल भक्ति और प्रेम के भूखे हैं।
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