जगदीशपुरी में रहने वाली कर्मा बाई जी, भगवान जगन्नाथ जी की अनन्य भक्त थीं। भले ही वे पूजा-पाठ की विधि से अनजान थीं, परंतु अपने प्रेम और वात्सल्य से भगवान की नित्य सेवा करती थीं।एक दिन, कर्मा बाई जी ने देखा कि मंदिर में भगवान को भोग देर से लगाया जाता है। इससे उनका मन उदास हो गया और उन्होंने घर पर ही खिचड़ी बनाकर भगवान को भोग लगाने का प्रण लिया।
प्रातः काल उठते ही वे खिचड़ी बनाने लगतीं और भगवान को भोग लगातीं। भगवान भी प्रतिदिन कर्मा बाई के घर खिचड़ी का भोग ग्रहण करने आते थे।कर्मा बाई जी पूजा-पाठ की विधि से अनजान थीं, इसलिए वे बिना स्नान किए ही खिचड़ी बना दिया करती थीं। और भगवान भी सहज ही वह खिचड़ी खा लिया करते थे।
एक दिन, कुछ संतों ने कर्मा बाई जी से पूजा में विलंब का कारण पूछा। तो उन्होंने बताया कि वे ठाकुर जी के लिए खिचड़ी बना रही थीं। यह सुनकर आचार्य को दुःख हुआ और उन्होंने कहा, "यह गलत है। बिना स्नान किए भगवान के लिए भोग नहीं बनना चाहिए। तुम पहले स्नान करके, चौका-बर्तन साफ करके फिर खिचड़ी बनाया करो। कर्मा बाई जी ने गुरुजनों का आदेश माना और अगले दिन नित्य कर्म से निवृत्त होकर खिचड़ी बनाई। इसमें काफी विलंब हो गया।
जब भगवान जगन्नाथ जी खिचड़ी ग्रहण कर रहे थे, तभी मंदिर का घंटा बज गया। भगवान बिना मुख साफ किए ही मंदिर की ओर प्रस्थान कर गए। मंदिर के अंदर पुजारी जी ने भगवान के मुख पर खिचड़ी लगी देख पूछा, “प्रभु, आपके मुख पर यह खिचड़ी कैसे लगी है? श्री जगन्नाथ जी बोले, "मेरी एक भक्त है कर्मा बाई, वह मुझे अत्यंत प्रिय है। वह प्रातः काल खिचड़ी का भोग बड़े प्रेम से अर्पण करती है।परंतु एक संत वहां गए और उन्होंने कर्मा बाई को पूजा-पाठ की विधि बताकर चले गए। लेकिन मेरी अनेक उपासना की विधियां हैं। मैं अपने हर एक भक्त के लिए अनेक तरह से उनकी सेवा ग्रहण करता हूं।
इसलिए अब आप कर्मा बाई जी से कह दे कि वे अपने अनुसार नित्य प्रातःकाल खिचड़ी बना दिया करें। उनके लिए पूजा विधान विधि अनिवार्य नहीं है। संत शीघ्र कर्मा बाई जी के घर पहुंचे, उनसे क्षमा याचना की और बोले, आप अपनी विधि से खिचड़ी बनाएं, उनकी विधि श्रेष्ठ है।
भगवान की भक्त कर्मा बाई जी जब तक जीवित रहीं, उन्होंने भगवान को भोग लगाया और भगवान ने भी बड़े प्रेम से कर्मा बाई का भजन सदैव ग्रहण किया।
बोलिए श्री जगन्नाथ महाराज की जय!
यह कहानी हमें सिखाती है कि भगवान भक्तों की भक्ति और प्रेम को स्वीकार करते हैं, चाहे वे पूजा-पाठ की विधि से अनजान ही क्यों न हों।
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