गिरिराज मंदिर मथुरा
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मथुरा और वृंदावन: भगवान श्री कृष्ण के पावन स्थलों की यात्रा
मथुरा और वृंदावन में भगवान श्री कृष्ण से जुडे अनेक धार्मिक स्थल हैं। किसी एक का स्मरण करो तो दूसरे का ध्यान स्वतः ही आ जाता है। मथुरा के इन्हीं मुख्य धार्मिक स्थलों में गिरिराज धाम का नाम आता है। सभी प्राचीन शास्त्रों में गोवर्धन पर्वत का वर्णन किया गया है। गोवर्धन के महत्त्व का वर्णन करते हुए कहा गया है कि गोवर्धन पर्वत गोकुल पर मुकुट में जड़ी मणि के समान चमकता रहता है।
गिरिराज मंदिर कथा
गिरिराज मंदिर के विषय में पौराणिक मान्यता है कि श्री गिरिराज को हनुमान जी उत्तराखंड से ला रहे थे। उसी समय एक आकाशवाणी सुनकर वे पर्वत को ब्रज में स्थापित कर दक्षिण की ओर भगवान श्री राम के पास लौट गए थे। इन्हीं मान्यताओं के अनुसार भगवान श्री कृष्ण के समय में यह स्थान प्राकृतिक सौंदर्य से भरा रहता था। यहां अनेक गुफाएं होने का उल्लेख किया गया है।
गोवर्धन धाम कथा
गोवर्धन धाम से जुड़ी एक अन्य कथा के अनुसार गोकुल में इन्द्र देव की पूजा के स्थान पर गौ और प्रकृति की पूजा का संदेश देने के लिये इस पर्वत को अंगूली पर उठा लिया था। कथा में उल्लेख है कि भगवान श्री कृष्ण ने इन्द्र की पारंपरिक पूजा बंद कर गोवर्धन की पूजा ब्रज में की थी।
विस्तार से गोवर्धन कथा
ब्रज में प्रत्येक वर्ष इन्द्र देव की पूजा का प्रचलन था। इस पूजा पर ब्रज के लोग अत्यधिक व्यय करते थे, जो वहां के निवासियों के सामर्थ्य से कहीं अधिक होता था। यह देख कर भगवान श्रीकृष्ण ने सभी गांव वालों से कहा कि इन्द्र पूजा के स्थान पर जो वस्तुएं हमें जीवन देती हैं, भोजन देती हैं, उन वस्तुओं की पूजा करनी चाहिए।
भगवान श्रीकृष्ण की बात मानकर ब्रज के लोगों ने उस वर्ष देव इन्द्र की पूजा करने के स्थान पर पालतु पशुओं, सूर्य, वायु, जल और खेती के साधनों की पूजा की। इस बात से इन्द्र देव नाराज हो गए और नाराज होकर उन्होंने ब्रज में भयंकर वर्षा की। इससे सारा ब्रज जल से मग्न हो गया।
सभी दौड़ते हुए भगवान श्रीकृष्ण के पास आए और इस प्रकोप से बचने की प्रार्थना की। भगवान श्री कृष्ण ने उस समय गोवर्धन पर्वत अपनी अंगूली पर उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा की थी। उसी दिन से गिरिराज धाम की पूजा और परिक्रमा करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।
गिरिराज महाराज के दर्शन कलयुग में सतयुग के दर्शन करने के समान सुख देते हैं। यहां अनेक शिलाएं हैं। उन शिलाओं का प्रत्येक खास अवसर पर श्रंगार किया जाता है। करोड़ों श्रद्धालु यहां इस श्रंगार और गोवर्धन के दर्शनों के लिये आते हैं। गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा कर पूजा करने से मांगी हुई मन्नतें पूरी होती हैं। जो व्यक्ति 11 एकादशियों को नियमित रूप से गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करता है, उसे मनोवांछित वस्तु की प्राप्ति होती है।
यहां के मंदिरों में न कोई पुजारी है, न ही कोई प्रबंधक है। फिर भी सभी कार्य बिना किसी बाधा के पूरे होते हैं। यहां के एक चबूतरे पर विराजमान गिरिराज महाराज की शिला बेहद दर्शनीय है। इसके दर्शनों के लिये भारी संख्या में श्रद्धालु जुटते हैं। महाराज गिरिराज की शिला को अधिक से अधिक सजाने की यहां श्रद्धालुओं में होड़ रहती है। श्रंगार पर हजारों-लाखों नहीं बल्कि करोड़ों रुपये लगाए जाते हैं। यहां की वार्षिक सजावट का व्यय किसी बड़े मंदिर में चढ़ावे की धनराशि से अधिक होता है। यहां साल में चार बार विशेष श्रंगार और छप्पन भोग लगाया जाता है।
मुख्य अवसरों पर 56 भोग नैवेद्य
श्रीकृष्ण की उपासना अन्य देवों की तुलना में सबसे अधिक की जाती है। श्रीकृष्ण के विषय में यह मान्यता है कि ईश्वर के सभी तत्व एक ही अवतार अर्थात भगवान श्री कृष्ण में समाहित हैं। गिरिराज को भगवान श्रीकृष्ण के जन्म उत्सव के अलावा अन्य मुख्य अवसरों पर 56 भोग का नैवेद्य अर्पित किया जाता है। जिसमें पूरी, परांठा, रोटी, चपाती, मक्की की रोटी, साग, अन्य प्रकार की तरकारी, अंकुरित अनाज, उबाला हुआ भुट्टा, सभी प्रकार की दालें, कढ़ी, चावल, मिली-जुली सब्जी, सभी पकवान, मिठाई, पेड़ा, खीर, हलवा, गुलाबजामुन, जलेबी, इमरती, रबड़ी, मीठा दूध, मक्खन, मलाई, मालपुआ, पेठा, मीठी पूरी, कचोरी, समोसा, चावल, बाजरे की खिचड़ी, दलिया, ढोकला, नमकीन, मुरमुरा, भेलपुरी, चीले, अचार विशेषकर टींट का, चाट, टिक्की, चटनी, आलू, पालक आदि के पकोड़े, बेसन की पकोड़ी, मठ्ठा, छाछ, लस्सी, रायता, दही, मेवा, मुरब्बा, सलाद, नींबू में घिसी हुई मूली, फल, पापड़, पापड़ी, पान, इलायची, सौंफ, लौंग, शुद्ध बिस्कुट, गोली, टॉफी, चॉकलेट, गोलगप्पे, उसके खट्टे मीठे जल, मठरी-शक्कर पारा, खील, बताशा, आमपापड़, शहद, सभी प्रकार की गज्जक, मूंगफली, पट्टी, रेवड़ी, गुड़, शरबत, जूस, खजूर, कच्चा नारियल का भोग लगाया जाता है।
गोपाष्टमी
कार्तिक मास में ही दिवाली के ठीक 8 दिन पश्चात आती है, गोपाष्टमी। गोपाष्टमी पर गो-चारण पर जाने से पूर्व भगवान श्री कृष्ण-बलरामजी ने सभी गौओं का पूजन किया (दशम स्कंध, श्रीमद भागवत)। अतः इस दिन गौ-माता को तिलक करने व रोटी खिलाने की परंपरा है।
ऐसे भी मान्यता है कि धरती-माता आज के दिन ही प्रकट हुई थीं। प्रति दिन पृथ्वी-माँ को प्रणाम करने की परंपरा है ही और अक्षय-नवमी को तो विशेष ही। देव-उठनी एकादशी के दिन श्री धाम वृन्दावन, गोवर्धन परिक्रमा मार्ग का दर्शन देखते ही बनता है। लाखों भक्त जो वर्ष-भर किसी कारणवश परिक्रमा नहीं कर पाते, आज के दिन निकल पड़ते हैं, परिक्रमा के लिए विशेषकर श्री राधा-दामोदर मंदिर की।
गोवर्धन परिक्रमा
गोवर्धन के महत्व की सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटना यह है कि यह भगवान कृष्ण के काल का एक मात्र स्थिर रहने वाला चिन्ह है। उस काल का दूसरा चिन्ह यमुना नदी भी है, किन्तु उसका प्रवाह लगातार परिवर्तित होने से उसे स्थाई चिन्ह नहीं कहा जा सकता है।
इस पर्वत की परिक्रमा के लिए समूचे विश्व से कृष्णभक्त, वैष्णवजन और वल्लभ संप्रदाय के लोग आते हैं। यह पूरी परिक्रमा 7 कोस अर्थात लगभग 21 किलोमीटर है। यहाँ लोग दण्डौती परिक्रमा करते हैं। दण्डौती परिक्रमा इस प्रकार की जाती है कि आगे हाथ फैलाकर ज़मीन पर लेट जाते हैं और जहाँ तक हाथ फैलते हैं, वहाँ तक लकीर खींचकर फिर उसके आगे लेटते हैं।
गिरिराज धाम, भगवान श्रीकृष्ण के जीवन और उनके अद्वितीय कार्यों का प्रतीक है। यह स्थल हमें उनकी महानता और उनके द्वारा प्रदत्त शिक्षा की याद दिलाता है। गिरिराज पर्वत की परिक्रमा, पूजा और श्रंगार के माध्यम से हम उनकी दिव्यता का अनुभव कर सकते हैं। यहाँ आकर हर श्रद्धालु को आत्मिक शांति और पुण्य की प्राप्ति होती है।
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